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डॉ. राधिका नागरथ को श्रीमठ काशी ने स्वामी विवेकानंद साहित्य-साधना सम्मान 2013 से सम्मान से नवाजा
By admin On 16 Sep, 2013 At 04:53 AM | Categorized As Story | With 0 Comments

हरिद्वार 15 सितंबर। स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जयंती के अवसर पर हरिद्वार में आयोजित एक राष्टÑीय संगोष्ठी में अंग्रेजी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वरिष्ठ पत्रकार डॉ. राधिका नागरथ को स्वामी विवेकानंद साहित्य-साधना सम्मान 2013 से सम्मानीत किया गया। उन्हें उनकी शोध पुस्तक “स्वामी विवेकानंद- द नोन फिलोसफर द अननोन पोएट” को अत्यंत उत्कृष्ठ शोध ग्रंथ के रूप में जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्मारक सेवा न्यास श्री मठ पंचगंगा काशी, वाराणसी उत्तरप्रदेश द्वारा यह सम्मान दिया गया। इस अवसर पर रामानंदाचार्य पीठ के आचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य महाराज एवं उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री ने डॉ. राधिका नागरथ को गणेश प्रतिमा, शाल, रूद्राक्ष की माला एवं सम्मान पत्र •ोंट किया।
डॉ. राधिका नागरथ ने स्वामी विवेकानंद जी के अंग्रेजी कवि के रूप में उनके इस दुलर्•ा पक्ष को बड़ी ही बारीकी और 7 सालों के गहन अध्ययन के बाद उकेरा है। उनके इस शोध कार्य को अमेरिका की वर्कले जैसे पुस्तकालयों में विशेष रूप से अध्ययन के लिए रखा गया है।इस अवसर पर उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंज़्त्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि स्वामी विवेकानंद जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे स्वयं एक सिद्ध महात्मा थे। स्वामी जी एक ओजस्वी संन्यासी थे। वे एक देश •ाक्त संन्यासी थे। वे एक महान समाज सुधारक थे। स्वामी जी का दिव्य व्यक्तित्व उनकी वाणी में प्रकट होता है। जगदगुरू रामानंदाचार्य रामनरेशाचार्य महाराज ने कहा कि स्वामी विवेकानंद जी ने हमें सिखाया है कि कैसे मन की चंचलता को नष्ट कर इसे किस प्रकार अपने काबू में लाये और मनुष्य के अंदर विखरी हुई शक्तियों को समेट कर सर्वोच्च ध्येय में कैसे एकाग्र करें। उन्होंने कहा कि हर युग में स्वामी जी के विचार प्रासंगिक रहेंगे। स्वामी जी ने अपने व्याख्यानों में वेदांत के गूढ तत्त्वों को सरल, स्पष्ट और सुंदर रूप में विवेचना की है। जिस वजह से पूरी दुनिया का ध्यान स्वामी जी के विचारों की ओर गया। स्वामी सच्चे मानवतावदी थे। उन्होेंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने हमारे सनातन धर्म की श्रेष्ठता को सम्पूर्ण विश्व के सामने रखकर यह बताया कि •ाारत की वैदिक कालीन स•यता विश्व की अन्य सफलताओं से सर्वश्रेष्ठ है। स्वामी की स•ाी धर्मों की एकता में विश्वास रखते थे। लेखिका-पत्रकार डॉ. राधिका नागरथ ने जगदगुरू शंकराचार्य के निर्वाणष्टकम् से उद्घृत कुछ पंक्तियों को उद्घृत करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद ने स्वयं इनका अंग्रेजी में काव्य अनुवाद पाश्चात्य अनुयायियों के लिए किया था। उनकी रचनाओं में आध्यात्म की वो उच्चतम अवस्था, जिसमें जीवन शिव से प्रकात्मकता का अनु•ाव करता है, इस •ााव का वर्णन मिलता है। डॉ. राधिका नागरथ ने कहा कि उस अवस्था का अनु•ाव या तो 19 वीं शताब्दी के पुर्नजागरण में अहम •ाूमिका नि•ााने वाले विवेकानंद कहर सकते है या फिर 21 वीं शताब्दी के धर्माचार्य रामानंदाचार्य। आम आदमी तो धर्म के बाहरी नाम रूप से फंसा द्वंद्वों में ही उम्र गुजार देता है। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने समाज को धर्म की नई परि•ााषा दी। उनका मानना था कि धर्म सिद्धान्तवादी नहीं अपितु व्यवहार की वस्तु है। नारायण तक पहुँचने के लिए दरिद्र नारायण की सेवा सहज मार्ग है। उन्होंने यह •ाी कहा कि धर्म बींग और विकसिंग है। अच्छा बनना और अच्छा करना यही धर्म की समग्रता है। पाप और पुण्य का बहुत ही सरल शब्दों में व्याख्या दी जो केवल खुद के लिए किया जाए वह पाप है, दूसरों के लिए किया हुआ कार्य पुण्य हो जाता है। सूर्यप्रसाद दीक्षित लखनऊ ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने हमारे सनातन धर्म की श्रेष्ठता को सम्पूर्ण विश्व के सामने रखकर यह बताया कि •ाारत की वैदिक कालीन स•यता विश्व की अन्य सफलताओं से सर्वश्रेष्ठ है। इस अवसर पर डॉ. बलदेव बख्शी, प्रोफेसर कैलाश नाथ तिवारी, प्रो. रमाकांत आंगिरस, महंत •ावान दास, महंत रघुवीर दास आदि ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. उदय प्रताप सिंह ने किया। इस अवसर पर स्वास्थय मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी ने डॉ. उदय प्रताप सिंह की पुस्तक सप्तशताब्दी महोत्सव खंड का विमोचन किया।

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