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डॉ राधिका नागरथ की कलम से—सफरनामा
By Gaurav Kashyap On 11 Apr, 2018 At 06:04 AM | Categorized As Religion, Spiritualism, Travels | With 0 Comments

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कनेडा के मेहनतकश भारतीयः-

मैं अपनी कज़न सिस्टर के घर पर मारखम में दस दिन के लिए रूकी थी, चार दिन की कांफ्रेंस के बाद। मौंरियाल जो क्यूबैक प्रोविंस में है, फ्रांसीसी इलाका है कनेडा का और वहाँ से लगभग 7 घंटे की रोड ड्राइव से मैं औंटारियो स्टेट के मारखम शहर में पहुँची। फाल सीज़न का भरपूर आनंद आंखों को मिल रहा था। गाड़ी का ड्राइवर भी पंजाबी निकला तो अपने देश से आए मेहमान, मुझ से, वो सारे अपने परिवार और संघर्षों की बातें करता रहा। बाकी पैसेंजर्स नीगरो थे, जो कार में सो रहे थे। कार मोंट्रियल गुररुद्वारा पर रुकी, जहाँ से कुछ सिक्ख युवतियाँ भी हमारे संग चढ़ी। पूरा भारत ही बन गया था कुछ देर के लिए यह कनेडा मानो

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Gurdwara of Montreal

Gurdwara of Montreal

मौंरोयाल का गुरूद्वारा बहुत ही आलीशान था। यह देखकर खुशी हुई कि एक भारत की कौम ने इतना वर्चस्व इस फ्रांसीसी देश में बना लिया है। भागकर कुछ फोटो खींचे और गुरूद्वारे में प्रशाद लिया। फिर आगे की यात्रा प्रारंभ हुई।

मेरे पास केवल 70 डालर थे उन 150 में से जिसमें से 50 टैक्सी वाले को देने थे। वो बीस डालर को बड़ी हिफाज़त और संभल-संभल के खर्च कर रही थी। सफर के दौरान एक जगह टैक्सी वाले ने ब्रेक दिया। वहाँ उस पंजाबी महिला और बच्चे के साथ मैं भी उतरी। मैं डिस्पले बोर्ड पर मीनु पढ रही थी और रेट देख कर चौंक रही थी कि सबसे सस्ता और खाने योग्य क्या आईटम है। फिर मैंने उस कैनेडियन युवती से सलाह की तो उसने बोला अगर आपको काफी ज़्यादा कडवी लगती है तो फ्रैंच वैनीला लो और यहाँ का बेकन फेमस है। ( बेकन डोनट जैसा बेक किया हुआ था ) मैंने लाईन में लगकर यह दोनों लेने के लिए हाथ बढ़ाया पर अपनी पंजाबी पन ( जी आयां नू ) वाले सिद्धांत को पूरा करते हुए उस महिला ने मुझे बेकन और फ्रैंच वैनीला गिलास आॅफर कर पैसे लेने से इंकार कर दिया। ‘तुसी इंडिया तो आए साड्डे मेहमान हो,’  यह कहकर. हम टैक्सी में ड्राइव के साथ ड्रिंक लेते मारखम की ओर बढे।
बड़ी हैरत हुई कि टूटी फूटी अंग्रेजी में यह पंजाबी कम्युनिटी जो इस देश में आकर बस गई, कैसे अपने जीविका के साधन निर्वाह कर रही है। वाक्य पूरा न बोल कुछ अंग्रेजी शब्दों से ही वे पैसेंजर से उसका गंतव्य स्थल पूछते हैं और फोन पर और आॅनलाईन इसकी बुकिंग हो जाती हैं। यह टैक्सीआं मौंट्रियल के मैक्गिल कैंपस से कुछ दूर मैट्रो स्टेशन से सवारियों को उठा उन्हें कनेडा के अलग-अलग शहरों जैसे ब्रांपटन, टोरौंटो, मारखम पर छोड़ती हैं।

वैसे ग्रेहाऊंड बस सर्विस भी अच्छी है किन्तु बस पकड़ने हेतु क्या गाइड लाइनस बरतनी होंगी और कैसे उस स्टाप तक पहुँचना होगा। यह सब जानकारी प्राप्त करना काफी मुश्किल काम है जब तक कि कोई जानता नहीं । मेरे गुरू भाई आदित्य ने मेरी काफी मदद की यह सब लाईनप करने में। उसे मैने इंटरनैट पर फेसबुक से ही ढूँढा था मैक्गिल यूनिवर्सिटी की फ्रैंड लिस्ट में। सभी भारतीय नाम के स्टूडैंटस को मैने रिक्वैस्ट भेजी जिसमें आदित्स ने रिस्पौंस किया था। और ऋतू दीदी तो सदा प्रेरणा दे ही रही थी आदित्य के फ़ोन  के माध्यम से.

21 साल का आदित्य अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर चुका था और उसे एम ए में दाखिले के लिए रिज़ल्ट आने का इंतजार था। ’’मेरा समय आजकल ठीक नहीं चल रहा, शाम को पार्ट टाईम नौकरी करता हूँ लेकिन अच्छा खाना खरीदने को पैसे नहीं बचते। मेरा मन करता है मैं खूब दुनिया में घूमूँ और मेरे पास पर्याप्त पैसा हो जैसा ईशा के पास है,“आदित्य ने मुझसे शेयर किया था। ईशा लैक्चरर थी जिसने वहीं से 5 साल पढ़ाई की थी।

कितनी छोटी उम्र में यह बच्चे अपनी लाईफ और कैरियर के लिए चिंतित हो जाते हैं। मैंने हरिद्वार में बहुत कम स्टूडैंटस को पढ़ाई के साथ नौकरी के लिए इतने आतुर होते देखा है। विदेशो में जो बच्चे भारत से पढ़ने जाते हैं वे बहुत जल्दी जिन्दगी की ज़रूरतों को समझने लगते हैं। मुझे ऐसा महसूस हुआ। उसका नाॅलेज लैवल भी मुझे पी एच डी के स्टैडर्ड का लगा। योग वशिष्ठ जैसी पुस्तकें मैंने पी एच डी के दौरान ही पढ़ी जबकि वह ग्रेज्युएशन के दौरान भी भारतीय दर्शन के गूढ रहस्यों पर मीमांसा पढ़ने का इच्छुक था जैसे उसके प्रोफैसर उसे मार्गदर्शन करते थे।

 

 

 

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