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माई पीताम्बरी जंयती के अवसर पर विशेष आलेख—मां त्रिपुरा देवी को पूजा जाता है मां पीताम्बरी के रूप में भी
By Gaurav Kashyap On 23 Apr, 2018 At 12:10 PM | Categorized As Religion | With 0 Comments

  • रमाकान्त पन्त

बेरीनाग 23 अप्रैल। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बेरीनाग की भूमि काफी समृद्वशाली है, इस क्षेत्र में स्थित नाग मंदिर सदियों से परम आस्था का केन्द्र है, शिवालय व शक्ति पीठों की लम्बी श्रृंखला इस भूमि के अलौकिक महत्व को दर्शाती है झर-झर झरते हुए झरनें, कल-कल  धुन में नृत्य करती नदियां, हिमालय की चोटियां, प्रकृति का अनुपम वातारण, सीढ़ीनुमा सुन्दर खेत, दवेदार, बांज, उतीश, काफल बुरांश के मनोहारी वन कदम कदम पर स्थित लोक देवताओं के मंदिर, साधनाओं हेतु गुफाओं की एकान्तता सहित आध्यात्मिक महत्व के अनेकानेक स्थल बेरीनाग अर्थात् नाग भूमि की शोभा को पग-पग पर प्रर्दर्शित करती है, तमाम दिव्य स्थलों के बीच बेरीनाग क्षेत्र में स्थित त्रिपुर सुन्दरी मां भगवती का दरबार महान आस्थाओं का केन्द्र है।
राईआगर नामक कस्बे से बेरीनाग जाने वाले मार्ग पर स्थित त्रिपुर सुन्दरी अर्थात् त्रिपुरा देवी के प्रति स्थानीय भक्तों में अगाध श्रद्वा है, मान्यता है, कि देवी के इस दरबार में भक्तों द्वारा मांगी गयी मनौती अवश्य पूर्ण होती, दस महाविद्याओं में एक माता त्रिपुरा देवी के बारे में कहा जाता है, कि जगत के पालन हार भगवान विष्णु ने दस हजार वर्षों तक मां की आराधना कर सुन्दर रुप को वरदान स्वरुप मां से प्राप्त किया इस दरबार में स्थित इनके श्री चक्र को श्री यन्त्र भी कहा जाता है, मान्यता है, कि देवी के इस शक्ति दरबार से इनकी साधना से भक्त जो इच्छा करेगा उसे सहज में ही प्राप्त कर लेगा, ये त्रिपुरा समस्त भुवन में सबसे अधिक सुन्दर है, इनकी पलक कभी नही गिरती है, श्याम वर्ण के रुप में काली व गौरे वर्ण के रुप में राज राजेष्वरी इन्हीं को कहा जाता है, सौन्दर्य, रुप, श्रृगार, विलास, स्वास्थ्य सभी कुछ इनकी कृपा से प्राप्त होती है। ये श्री कुल की विद्या है, इनकी पूजा गुरु मार्ग से की जाती है, ये साधक को पूर्ण समर्थ बनाती है यहां इनकी पूजा के साथ-साथ बाला त्रिपुर सुन्दरी की भी पूजा की जाती है। त्रिपुरा देवी के इस स्थान पर इनकी साधना से साधक की कुण्डलिनी शक्ति खुल जाती है। इन्होंने ही विश्व की रक्षा के लिए बगलामुखी अर्थात् माई पीताम्बरी का रुप धारण किया अपने भक्तों की सभी प्रकार से देखभाल करने वाली दयामयी तथा करुणा रखने वाली त्रिपुरा देवी की महिमा अपरम्पार है।
उपनिषदों के भीतर त्रिपुरा देवी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है, एक मात्र त्रिपुरा देवी ही सृष्टि से पूर्व थी, उन्होंने ब्रहमाण्ड की सृष्टि की वे कामकला के नाम से बिख्यात है, वे ही श्रृगांरकला कहलाती है, उन्हीं से ब्रहमा उत्पन्न हुए, विष्णु प्रकट हुए, रुद्र प्रादुर्भूत हुए उन्हीं से समस्त मरुद्गण उत्पन्न हुए उन्हीं से गाने वाले गन्धर्व, नाचने वाली अप्सरांए, और बाद्य बजाने वाले किन्नर सब  उत्पन हुए सब कुछ शक्ति से ही उत्पन हुआ मनुष्य सहित समस्त प्राणियों की सृष्टि भी उन्हीं से हुई, वे ही अपराशक्ति है, वे ही शाम्भवी विद्या, सहित समस्त विद्याऐं कहलाती है, वे ही रहस्यरुपा है, वे ही प्रणववाच्य अक्षर तत्व है, ऊॅं अर्थात् सचिदानन्द स्वरुपा वे ही वाणी मात्र में प्रतिष्ठित है, वे ही जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति इन तीनों पुरों तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों पुरों तथा स्थूल, सूक्ष्म, और कारण इन तीनों प्रकार से शरीरों को व्याप्त कर बाहर और भीतर प्रकाश फैला रही है, देश, काल,  और वस्तु के भीतर अंसग होकर रहती हुई वे महात्रिपुर सुन्दरी प्रत्यक् चेतना है। सत् चित् और आनन्द रुप लहरों वाली श्री महात्रिपुर सुन्दरी बाहर और भीतर प्रविष्ठ होकर स्वंय अकेली ही विराजमान हो रही है, उनके अस्ति, भाति, और प्रिय इन तीन रुपों में जो अस्ति है वह सन्मात्र का बोधक है, जो भांति है वह चिन्मात्र है, और जो प्रिय है, वह आनन्द है, इस प्रकार सब आकारों में श्री महात्रिपुर सुन्दरी ही विराजमान है। बेरीनाग के समीप स्थित त्रिपुरा देवी का दरबार युगों-युगों से हिमालयी भूमि में अगाध श्रद्वा के साथ पूज्यनीय है, निकटवर्ती  ग्रामीण क्षेत्र के लोग जब किसी कार्य का शुभारम्भ करते हैं, तो सर्वप्रथम महामाया महात्रिपुर सुन्दरी का स्मरण करते है, बना, पभ्या, राईआगर, आदि अनेक ग्रामों के लोगों की आवाजाही यहां निरन्तर बनी रहती है, महर्षि भृगऋषि की तपोभूमि कोटेष्वर की गुफा, धौलीनाग, पियलनाग, बेड़ीनाग, बिलकोट की देवी सहित तमाम तीर्थस्थल त्रिपुरा देवी के निकटवर्ती क्षेत्रों में स्थित है, जनपद पिथौरागढ़ के राईआगर और बेरीनाग के बीच स्थित यह शक्ति पीठ साधना की दृष्टि से सर्वोतम तीर्थ माना गया है।

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